बार का अपराधीकरण न्याय व्यवस्था खोखला कर रहा:हाईकोर्ट में वकीलों की हिंसा पर खंडपीठ ने लिया संज्ञान, कार्रवाई को कहा

Nov 02, 2026 - 19:07
0
बार का अपराधीकरण न्याय व्यवस्था खोखला कर रहा:हाईकोर्ट में वकीलों की हिंसा पर खंडपीठ ने लिया संज्ञान, कार्रवाई को कहा
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 28 अक्टूबर 2026 को कोर्ट नंबर 49 में वकीलों के एक समूह द्वारा की गई मारपीट, तोड़फोड़ और कार्यवाही बाधित करने की घटना का स्वतः संज्ञान लिया है। न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने 29 अक्टूबर के आदेश में प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना और आपराधिक अपराध का मामला बनता पाया। इतना शोर मचाया कि अदालतों को उठना पड़ा पीठ के अनुसार सुबह अदालत बैठने से पहले ही पीठ सचिव ने सूचना दी थी कि कोर्टरूम में जुटे वकील नारेबाजी कर रहे हैं। कार्यवाही शुरू होने पर वरिष्ठ अधिवक्ता वी.पी. श्रीवास्तव ने हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों के 27 अक्टूबर के पत्र का हवाला दिया और कहा कि उनके साथ कोई अपमान नहीं हुआ। इसके बाद वकीलों ने इतना शोर मचाया कि अदालत को उठना पड़ा। कोर्ट रूम में पीटा गया कोर्ट के उठने के बाद अपर शासकीय अधिवक्ता (प्रथम) परितोष कुमार मालवीय को कोर्टरूम में पीटा गया। वे सूजे हुए चेहरे के साथ जज के चैंबर पहुंचे और जान बचाने की गुहार लगाई। उनका कहना था कि हमलावरों ने राज्य की ओर से पैरवी करने पर धमकी भी दी। हाई कोर्ट डिस्पेंसरी के डॉक्टर ने चैंबर में ही उपचार किया। अन्य एजीए संजीव पांडेय, प्रदीप जायसवार और संदीप तिवारी ने भी घटना की पुष्टि की। रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट के अनुसार अन्य एजीए, कोर्ट स्टाफ और तैनात सुरक्षाकर्मियों पर भी हमला हुआ तथा फर्नीचर तोड़ा गया। पीठ ने वीडियो भी देखे, जिनमें हमलावर वकील पहचाने जा सकते हैं। विवाद की जड़: 27 अक्टूबर का पत्र पीठ ने घटना की जड़ बार पदाधिकारियों डॉ. सी.पी. उपाध्याय (अध्यक्ष-निर्वाचित) और संतोष कुमार मिश्र (महासचिव-निर्वाचित) के 27 अक्टूबर के पत्र को बताया। पत्र में आरोप था कि पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए अलग कुर्सी की व्यवस्था की गई, एक वकील से जबरन माफी मंगवाई गई, जज ने उंगली दिखाकर वकील को जेल भेजने का आदेश दिया और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीवास्तव का अपमान हुआ। कोर्ट ने इन्हें भ्रामक या असत्य बताया। बैठने की व्यवस्था- अदालत की सहायता के लिए बुलाए गए अधिकारी के लिए कुर्सी रखी जाती है। इस पर पहले कभी आपत्ति नहीं हुई। अधिवक्ता से माफी मंगवाई- एक वकील ने अदालत में मौजूद वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को धक्का देने की कोशिश की थी। उसने स्वयं माफी मांगी, उसे बाध्य नहीं किया गया। जेल भेजने का आदेश -ऐसा कोई आदेश न दिया गया, न रिकॉर्ड में है। वी.पी. श्रीवास्तव- उन्होंने खुली अदालत में पत्र का खंडन किया। पीठ ने श्रीवास्तव के साहस की सराहना की और कहा कि उन्होंने उग्र भीड़ के बीच अकेले खड़े होकर सच बोला। पीठ ने पत्र की भाषा को भड़काऊ मानते हुए उसमें और हिंसा के बीच सीधा संबंध माना। सोशल मीडिया पर टिप्पणी कोर्ट ने कहा कि घटना के बाद सोशल मीडिया पर झूठे और भ्रामक दावों की बाढ़ आ गई, जिससे हाईकोर्ट की छवि को नुकसान पहुंचा। पीठ ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों पर नए सिरे से विचार की जरूरत बताई। साथ ही कहा कि निर्णयों की आलोचना का अधिकार है, पर जजों पर व्यक्तिगत हमले और धमकियां संरक्षित नहीं हैं। वकीलों के आपराधिकरण पर चिंता पीठ ने मोहम्मद कफील बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और लखनऊ बेंच के स्वतः संज्ञान वाले मामले (21 जुलाई 2026 की घटना) का हवाला दिया। इनमें वकीलों के आपराधिक पृष्ठभूमि वाले होने और बार एसोसिएशनों की निष्क्रियता पर चिंता जताई गई थी। पीठ ने कहा कि यह "बार का आपराधिकरण" न्याय1 व्यवस्था की नींव को खोखला कर रहा है। साथ ही कहा कि अदालतों में प्रवेश के नियमन की विफलता और चैंबर प्रणाली के कमजोर होने जैसे कारण भी इसके पीछे हैं। पीठ ने सरकारी अधिवक्ताओं को भी अन्य अधिवक्ताओं के बराबर सम्मान का हकदार बताया। कोर्ट के निर्देश- 1. संबंधित वकीलों के विरुद्ध प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना की कार्यवाही चलाई जाए। 2. मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए, ताकि उसे उपयुक्त पीठ को भेजा जा सके। 3. मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया गया कि रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दें कि वे उकसावे, हिंसा की साजिश, हिंसा और तोड़फोड़ तथा अन्य अपराधों के लिए वकीलों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराएं। 4. 27 और 28 अक्टूबर की घटना पर झूठी सोशल मीडिया पोस्ट डालने वालों के विरुद्ध भी एफआईआर दर्ज हो और ऐसी पोस्ट ब्लॉक व डिलीट कराई जाएं। 5. रजिस्ट्रार जनरल की 28 अक्टूबर की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में रिकॉर्ड पर रखी जाए। सराहना और राज्य का दायित्व- पीठ ने वी.पी. श्रीवास्तव और एजीए परितोष कुमार मालवीय, संजीव पांडेय, प्रदीप जायसवार, शहनवाज खान तथा संदीप तिवारी की प्रशंसा की, जो सच बोलने और अदालत की प्रक्रिया की रक्षा के लिए डटे रहे। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने विधि अधिकारियों को सुरक्षा दे।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User