बेटियों की लंबी उम्र के लिए रखा अहोई अष्टमी व्रत:मेरठ की मांओं ने बदली परंपरा, कहा- बेटा भाग्य से मिला तो बेटी सौभाग्य से
संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए रविवार को माताएं अहोई अष्टमी का व्रत रखेंगी। यह व्रत अधिकतर महिलाएं बेटों के लिए रखती रही हैं, लेकिन अब मेरठ में कुछ माताएं इस परंपरा को नई सोच के साथ आगे बढ़ा रही हैं। वे बेटों के साथ अपनी बेटियों के लिए भी अहोई अष्टमी का व्रत रख रही हैं। उनका कहना है कि मां के लिए संतान संतान होती है, उसमें बेटा और बेटी का भेद नहीं होना चाहिए। बेटियां भी परिवार की खुशियों और जीवन का आधार हैं। उनकी लंबी उम्र, स्वास्थ्य और तरक्की की कामना करना भी उतना ही जरूरी है। दो बेटियां होना मेरे लिए सौभाग्य की बात मेरठ निवासी आकांक्षा सेठी अपनी दोनों बेटियों तिश्या और गार्वी के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। उन्होंने बताया कि इस पावन अवसर पर वह अपनी दोनों बेटियों की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। उन्हें गर्व और अपार खुशी है कि ईश्वर ने उन्हें दो प्यारी बेटियों का आशीर्वाद दिया है। उनकी बेटियां उनके जीवन की अनमोल धरोहर और खुशियों का आधार हैं। आकांक्षा का कहना है कि दो बेटियों की मां होना उनके लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है। वह खुद को धन्य मानती हैं कि उन्हें तिश्या और गार्वी जैसी बेटियों का साथ मिला है। बेटा भाग्य से मिला, बेटी सौभाग्य से वहीं, व्रत रखने वाली खुशबू ने बताया कि वह अपने बेटे के साथ बेटी के लिए भी अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। उनका कहना है कि बेटा उन्हें भाग्य से मिला है, लेकिन बेटी सौभाग्य से मिली है। इसलिए वह दोनों बच्चों की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं। अब समय बदल रहा है और बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं रह गया है। मां के लिए दोनों का महत्व बराबर है। संतान चाहे बेटा हो या बेटी, उसकी सलामती और तरक्की की कामना ही इस व्रत का भाव है। बेटी की खुशहाली के लिए रखती हैं व्रत मेरठ की रहने वाली कनिका सक्सेना भी अपनी बेटी जयंती के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। उनका मानना है कि बेटियों के लिए भी वही प्रेम, चिंता और आशीर्वाद होना चाहिए, जो बेटों के लिए होता है। मेरठ की ऐसी कई माताएं हैं, जो इस व्रत के जरिए बेटियों के प्रति अपने प्रेम और समान अधिकार की सोच को सामने रख रही हैं। उनका कहना है कि बेटियों की मां होने पर उन्हें उतनी ही खुशी और गर्व है, जितना किसी बेटे की मां को होता है। उनके लिए बेटी परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि खुशियों और गर्व का कारण है। बदल रही है सोच, संतान के लिए है व्रत अहोई अष्टमी की परंपरा में मेरठ की इन महिलाओं की पहल समाज में बदलती सोच को दिखाती है। उनका कहना है कि जब मां अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है तो उसमें बेटे और बेटी का अंतर क्यों हो। उनके लिए व्रत का महत्व संतान की लम्बी उम्र और सुख से जुड़ा है, न कि उसके बेटा या बेटी होने से।
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