खून और जल दोनों एक साथ नहीं बहेंगे:संस्कृति संसद में संत बोले- फरक्का-सिंधु समझौते रद्द करें सरकार,वर्ष प्रतिपदा पर आएगी हिंदू आचार संहिता
महादेव की नगरी काशी में तीन दिनों तक चली छठी संस्कृति संसद का समापन कई अहम संकल्पों के साथ हुआ। संतों और धर्माचार्यों ने तीन प्रमुख प्रस्तावों पर मुहर लगाई। इनमें विदेशों में मौजूद मनुस्मृति की मूल पांडुलिपियों को भारत वापस लाने, हिंदू आचार संहिता की घोषणा और धर्मांतरण पर अंकुश लगाने जैसे मुद्दे शामिल रहे। संत समिति के महामंत्री स्वामी जीतेंद्रनंद सरस्वती ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि संस्कृति संसद का उद्देश्य काशी को सनातन हिंदू धर्म की वैश्विक राजधानी के रूप में स्थापित करना और यहां से देश-समाज के लिए विचारों का मंथन करना है। इस बार संसद में देश के सभी राज्यों से संत पहुंचे। 127 संप्रदायों के प्रतिनिधियों और कुल 1680 संतों ने पंजीयन कराकर अपने विचार रखे। खून और जल दोनों एक साथ नहीं बहेंगे : गंगा महासभा स्वामी जीतेंद्रनंद बोले - गंगा महासभा ने फरक्का जल समझौते और सिंधु जल समझौते को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए इन्हें स्थायी रूप से रद्द करने की मांग उठाई। महासभा का कहना है कि नदियों के जल पर उद्गम स्थल वाले देश का अधिकार होना चाहिए और ऐसे समझौते नहीं होने चाहिए, जिनसे भारत के हितों को नुकसान पहुंचे। गंगा महासभा के प्रतिनिधि ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के अनुसार नदी के उद्गम स्थल वाले देश को उसके जल पर अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि गर्मियों में पाकिस्तान और बांग्लादेश को पानी मिले, जबकि बाढ़ के दौरान भारत के पंजाब, बिहार और झारखंड को नुकसान उठाना पड़े, यह कैसी व्यवस्था है? सिंधु जल समझौते को निलंबित किए जाने पर महासभा ने कहा कि इसे केवल स्थगित रखने के बजाय पूरी तरह रद्द किया जाना चाहिए। प्रतिनिधि के मुताबिक, निलंबित समझौते को भविष्य में कोई सरकार बहाल कर सकती है, जबकि रद्द होने के बाद नए सिरे से समझौते की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। इससे भारत को अपने हितों के अनुरूप बातचीत का अवसर मिलेगा। फरक्का समझौते की अवधि समाप्त होने का दावा गंगा महासभा ने 1971 के फरक्का जल समझौते को लेकर भी सवाल उठाए। प्रतिनिधि ने दावा किया कि इस समझौते की अवधि 2025 के अंत में समाप्त हो चुकी है और भारत अब इसके तहत किसी बाध्यता में नहीं है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के साथ जल बंटवारे पर नए सिरे से विचार होना चाहिए। ‘बांग्लादेश के बंधुआ मजदूर नहीं हैं हम’ स्वामी जीतेंद्रनंद बोले - बांग्लादेश को गंगा का पानी दिए जाने पर तीखी टिप्पणी करते हुए प्रतिनिधि ने कहा कि भारत अपने नागरिकों और राज्यों के हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। उन्होंने कहा, “हम बांग्लादेश के बंधुआ मजदूर नहीं हैं कि वहां के मरते लोगों को पानी पिलाएं। खून और जल दोनों एक साथ नहीं बहेंगे।” दो साल में पांडुलिपियां वापस लाने का संकल्प संस्कृति संसद में मनुस्मृति की मूल पांडुलिपियों को विदेशों से भारत वापस लाने का संकल्प लिया गया। स्वामी जीतेंद्रनंद सरस्वती के मुताबिक, पांडुलिपियों को भारत से बाहर ले जाने का उल्लेख विलियम जोंस के पत्रों में मिलता है। अब इन्हें वापस लाने के लिए अगले दो वर्षों तक अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने बताया कि वर्ष 2028 में होने वाली अगली संस्कृति संसद में इन पांडुलिपियों को प्रस्तुत करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए संस्कृति मंत्रालय, गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से सहयोग मांगा जाएगा। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के माध्यम से भी प्रयास किए जाएंगे और भारतीय विद्वानों का प्रतिनिधिमंडल विदेशों में मौजूद पांडुलिपियों का अध्ययन करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मनुस्मृति की समीक्षा या उसमें परिवर्तन का अभियान नहीं है, बल्कि भारत की बौद्धिक संपदा को वापस लाने का प्रयास है। पांडुलिपियां आने के बाद देश के विद्वान उन पर विचार करेंगे। वर्ष प्रतिपदा पर घोषित होगी हिंदू आचार संहिता संस्कृति संसद में हिंदू आचार संहिता की घोषणा के लिए हिंदू नववर्ष यानी वर्ष प्रतिपदा की तिथि तय करने का निर्णय भी लिया गया। स्वामी जीतेंद्रनंद सरस्वती ने कहा कि नई पीढ़ी अक्सर पूछती है कि हिंदू होने के नाते उसे अपने जीवन में क्या करना चाहिए। इसी सवाल का जवाब देने के लिए सामान्य हिंदू के दैनिक जीवन और आचरण से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन तैयार किया जाएगा। एफसीआरए और एसआईआर के समर्थन में संत संसद में धर्मांतरण और विदेशी फंडिंग को लेकर भी चर्चा हुई। स्वामी जीतेंद्रनंद सरस्वती ने कहा कि धर्मांतरण की गति रुकी है और सरकार को एफसीआरए कानून के मुद्दे पर दृढ़ रहना चाहिए। उनका आरोप था कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत को तोड़ने के लिए किया जा रहा था। उन्होंने एसआईआर का समर्थन करते हुए कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक का रजिस्टर होना चाहिए। उनके अनुसार, एसआईआर का विरोध करने वालों को अपनी वजह स्पष्ट करनी चाहिए।
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