मिट्टी के दीयों से सालभर का सहारा:मैनपुरी में मिले इलेक्ट्रॉनिक चाक ने कुम्हारों के हुनर को दी रफ्तार

Nov 05, 2026 - 12:03
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मिट्टी के दीयों से सालभर का सहारा:मैनपुरी में मिले इलेक्ट्रॉनिक चाक ने कुम्हारों के हुनर को दी रफ्तार
मैनपुरी के बाजारों में चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रॉनिक लाइटों की चमक भले ही दीपावली की रौनक बढ़ा रही हो, लेकिन मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों के लिए यह त्योहार सिर्फ रोशनी का नहीं, बल्कि पूरे साल की रोजी-रोटी का सबसे बड़ा सहारा है। चार-पांच महीने पहले से शुरू होने वाली तैयारी, दिनभर चाक पर घूमते हाथ और परिवार के हर सदस्य की मेहनत के बाद तैयार होते हैं हजारों दीये। इनकी बिक्री से होने वाली कमाई से ही कई परिवारों का सालभर का खर्च निकलता है। हालांकि, मेहनत के मुकाबले मुनाफा कम होने और नई पीढ़ी की घटती रुचि ने इस पुश्तैनी कारोबार के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। कुम्हार सम्बले बताते हैं कि उनके परिवार में मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का काम कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। उन्हें खुद इस काम में करीब 20 साल हो चुके हैं। दीपावली के लिए चार से पांच महीने पहले ही तैयारी शुरू करनी पड़ती है। मिट्टी तैयार करने से लेकर दीये बनाने, सुखाने और पकाने तक पूरा परिवार जुटता है। इसके बावजूद कमाई का बड़ा हिस्सा लागत में चला जाता है। उनके मुताबिक, 60 से 70 रुपए की बिक्री में करीब आधा पैसा खर्च में निकल जाता है। सालभर में परिवार के पास खाने-पीने और अन्य खर्चों के बाद करीब 50 से 60 हजार रुपए ही बच पाते हैं। उनका कहना है कि इतनी मेहनत के बाद भी असल में सिर्फ मजदूरी ही निकल पाती है। नई पीढ़ी भी इस काम में ज्यादा रुचि नहीं दिखा रही है। वहीं, इलेक्ट्रॉनिक चाक ने कुम्हारों के काम करने का तरीका जरूर बदला है। युवा राहुल प्रजापति बताते हैं कि वे रक्षाबंधन के करीब एक महीने बाद से दीपावली के लिए दीये बनाने का काम शुरू कर देते हैं। एक दिन में ढाई से तीन हजार दीये तैयार कर लेते हैं। पूरे सीजन में करीब डेढ़ से दो लाख दीये बनाने का लक्ष्य रहता है। मिट्टी जुटाने, दीये बनाने, रंगाई और पकाने में काफी मेहनत और खर्च आता है। उनका कहना है कि इस बार बारिश के कारण दीये बनाने का काम प्रभावित हुआ है। दो-तीन दिन पहले हुई बारिश से माल कम तैयार हो पाया, जिससे बिक्री और कारोबार की रफ्तार भी प्रभावित हुई है। कुम्हार सुभाष कुमार प्रजापति के लिए सरकारी मदद ने इस पुश्तैनी काम को कुछ आसान जरूर बनाया है। वे करीब 20 साल से इस काम में जुड़े हैं। जिला उद्योग केंद्र और डूडा के माध्यम से उन्हें और उनकी पत्नी को इलेक्ट्रॉनिक चाक मिले हैं। सुभाष बताते हैं कि पहले पत्थर के चाक को डंडे से घुमाकर दीये और बर्तन बनाने पड़ते थे। इसमें ज्यादा ताकत लगती थी और जल्दी थकान हो जाती थी। अब इलेक्ट्रॉनिक चाक से कम मेहनत में ज्यादा काम हो जाता है। बिजली का खर्च जरूर आता है, लेकिन काम की रफ्तार बढ़ गई है। उन्हें सरकार की ओर से आवास का लाभ भी मिला है। सुभाष का बेटा राहुल भी पिता के साथ इस काम में हाथ बंटाता है। वह चाक पर तेजी से दीये और बर्तन बनाता है। सुभाष कहते हैं कि उन्होंने बेटे को यह हुनर सिखा दिया है, लेकिन आगे वह इस काम को जारी रखेगा या नहीं, यह कमाई पर निर्भर करेगा। उनका कहना है कि दीपावली के सीजन की बिक्री से ही पूरे साल के खर्च का इंतजाम होता है। जेब में कुछ पैसे बच जाते हैं, जिससे परिवार का गुजारा चलता है और किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती।

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