दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 25 जून 2026
11 वर्षों में सबसे कम बारिश का अनुमान
देश में इस वर्ष मॉनसून की चाल सुस्त बनी हुई है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार वर्ष 2026 में सामान्य से लगभग 10 प्रतिशत कम वर्षा हो सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो यह पिछले 11 वर्षों का सबसे कमजोर मॉनसून माना जाएगा। देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षा का असमान वितरण देखने को मिल रहा है, जिससे कई राज्यों में चिंता बढ़ गई है।
कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे जैसे हालात
एक ओर मुंबई और महाराष्ट्र के कई क्षेत्रों में भारी वर्षा से जनजीवन प्रभावित हो रहा है, वहीं दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के कई हिस्सों में अपेक्षित वर्षा नहीं हो रही है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार यही असंतुलन इस वर्ष के मॉनसून की सबसे बड़ी विशेषता बनकर सामने आया है।
अल नीनो बना बड़ी वजह
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस स्थिति के पीछे अल नीनो प्रमुख कारण है। प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग के गर्म होने से उत्पन्न यह प्राकृतिक घटना वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करती है। इसका सीधा असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर पड़ता है, जिससे वर्षा की मात्रा कम हो जाती है।अल नीनो के कारण मॉनसूनी हवाओं की ताकत कमजोर पड़ती है और वातावरण में उच्च दबाव वाले क्षेत्र बनने लगते हैं, जो वर्षा की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। हालांकि इसका असर पूरे देश में एक जैसा नहीं होता। कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है जबकि कुछ इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है।
मुंबई में देरी से पहुंचा मॉनसून
मुंबई में मॉनसून इस वर्ष अपने सामान्य समय से 13 दिन देर से पहुंचा। सामान्य तौर पर मॉनसून 10 जून तक मुंबई पहुंच जाता है, लेकिन इस बार इसकी दस्तक 23 जून के आसपास दर्ज की गई। वर्ष 2023 में भी मॉनसून 25 जून को पहुंचा था। इससे पहले 1958 और 1974 में सबसे अधिक देरी दर्ज की गई थी, जब मॉनसून 28 जून को मुंबई पहुंचा था।मंगलवार को मुंबई के विभिन्न इलाकों में 71 से 99 मिलीमीटर तक वर्षा दर्ज की गई, जिससे कई स्थानों पर जलभराव की स्थिति उत्पन्न हो गई।
अगस्त तक बने रह सकते हैं असामान्य हालात
आईएमडी के अनुसार अल नीनो का प्रभाव जून से सितंबर तक सक्रिय रह सकता है और सर्दियों तक इसकी तीव्रता बढ़ने की संभावना है। मौसम विभाग का अनुमान है कि जुलाई के अंत अथवा अगस्त तक अनियमित वर्षा का दौर जारी रह सकता है।कुछ क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण स्थानीय बाढ़ आ सकती है, जबकि बड़े भूभाग में सूखे जैसे हालात बने रहेंगे। सितंबर तक स्थिति में कुछ सुधार संभव है, लेकिन पूरे मॉनसून सीजन का प्रदर्शन सामान्य से कमजोर रहने की आशंका है।
कृषि और जल संसाधनों पर बढ़ेगी चुनौती
कमजोर मॉनसून का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। खरीफ फसलें जैसे धान, मक्का और सोयाबीन पर्याप्त वर्षा पर निर्भर करती हैं। वर्षा में कमी आने से उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे किसानों की आय और खाद्य आपूर्ति दोनों पर असर पड़ेगा।इसके अलावा जलाशयों में पानी का स्तर कम रहने की संभावना है, जिससे पेयजल और सिंचाई की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। महानगरों में गर्मी और जल संकट की समस्या बढ़ सकती है, जबकि अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में बाढ़ और बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ने का खतरा रहेगा।
बदलते मौसम का संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक कमजोर मॉनसून का मामला नहीं है बल्कि बदलते वैश्विक मौसम पैटर्न का संकेत भी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में चरम मौसम की घटनाओं में बढ़ोतरी भविष्य की बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में जल संरक्षण, कृषि प्रबंधन और आपदा तैयारी को मजबूत करना समय की आवश्यकता माना जा रहा है।