आधी बारिश से सूखे की आहट
जून 2026 समाप्ति की ओर है, लेकिन देश में मॉनसून सामान्य से काफी कमजोर बना हुआ है। कई क्षेत्रों में वर्षा की भारी कमी दर्ज की गई है। मौसम विशेषज्ञ इस स्थिति के पीछे अल नीनो प्रभाव को प्रमुख कारण मान रहे हैं, जिससे कृषि, जल भंडारण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर चिंता बढ़ गई है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 22 जून 2026
जून में बारिश का गंभीर संकट, अल नीनो ने बढ़ाई चिंता
देश में जून का महीना समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इस बार मॉनसून की चाल सामान्य वर्षों की तुलना में काफी कमजोर दिखाई दे रही है। भारतीय मौसम व्यवस्था के लिए जून का महीना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी अवधि में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून देश के अधिकांश हिस्सों में सक्रिय होकर कृषि, जल भंडारण और दैनिक जीवन को प्रभावित करता है। हालांकि वर्ष 2026 में अब तक की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देशभर में सामान्य औसत की तुलना में लगभग 46 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे किसानों से लेकर जल प्रबंधन एजेंसियों तक सभी की चिंता बढ़ गई है।
अल नीनो बना मुख्य कारण
वर्तमान स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो प्रभाव है। अल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर पूरी दुनिया के मौसम तंत्र पर पड़ता है और भारत में अक्सर कमजोर मॉनसून की स्थिति पैदा होती है। अल नीनो के प्रभाव से वातावरण में नमी का वितरण बदल जाता है। इससे बादलों के निर्माण और वर्षा की प्रक्रिया प्रभावित होती है। परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में बादल तो बनते हैं, लेकिन पर्याप्त वर्षा नहीं हो पाती। इस बार भी देश के अनेक हिस्सों में यही स्थिति देखने को मिल रही है।
कई राज्यों में सामान्य से बहुत कम बारिश
उत्तर भारत, मध्य भारत और कुछ पश्चिमी राज्यों में वर्षा की भारी कमी दर्ज की गई है। कई जिलों में अब तक औसत का आधा भी पानी नहीं बरसा है। मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि कुछ क्षेत्रों में बारिश का प्रतिशत सामान्य से 50 से 70 प्रतिशत तक कम रहा है।इस कमी का सीधा असर तापमान पर भी पड़ रहा है। कई राज्यों में गर्मी और उमस दोनों बढ़ गई हैं। लोगों को राहत देने वाली मानसूनी बारिश का इंतजार लंबा होता जा रहा है।
कृषि क्षेत्र पर सबसे बड़ा खतरा
कमजोर मॉनसून का सबसे अधिक प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है। भारत की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और खरीफ सीजन की फसलें मुख्य रूप से मानसूनी वर्षा के सहारे उगाई जाती हैं। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलों की बुवाई कई क्षेत्रों में धीमी पड़ गई है।किसानों का कहना है कि पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण खेतों में नमी की कमी बनी हुई है। कई स्थानों पर बुवाई टालनी पड़ रही है, जबकि कुछ इलाकों में पहले से बोई गई फसलों पर भी संकट मंडरा रहा है। यदि अगले कुछ सप्ताह में अच्छी बारिश नहीं हुई तो उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बढ़ सकती है।कमजोर मॉनसून का असर केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे खाद्यान्न कीमतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है।
जलाशयों और बांधों में बढ़ी चिंता
कम वर्षा का प्रभाव देश के प्रमुख जलाशयों और बांधों पर भी दिखाई देने लगा है। सामान्य परिस्थितियों में जून और जुलाई के दौरान जलाशयों में पानी का स्तर तेजी से बढ़ता है, लेकिन इस बार कई परियोजनाओं में अपेक्षित जल संग्रह नहीं हो पाया है। यदि वर्षा की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो सिंचाई परियोजनाओं, पेयजल आपूर्ति और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। कुछ राज्यों ने पहले ही जल संरक्षण और सावधानीपूर्वक उपयोग की अपील शुरू कर दी है।
शहरों में भी बढ़ सकता है जल संकट
ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी इलाकों में भी जल संकट की आशंका बढ़ रही है। कई महानगर पहले से ही भूजल स्तर में गिरावट की समस्या का सामना कर रहे हैं। यदि मानसून सामान्य स्तर तक नहीं पहुंचा तो आने वाले महीनों में पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन सकती है।वर्षा की कमी का प्रभाव केवल वर्तमान मौसम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरे वर्ष जल संसाधनों पर दिखाई देता है।
मौसम विभाग की निगाह आगामी सप्ताहों पर
भारतीय मौसम विभाग लगातार मॉनसून की गतिविधियों की निगरानी कर रहा है। विभाग के अनुसार आने वाले सप्ताहों में कुछ क्षेत्रों में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं, जिससे स्थिति में आंशिक सुधार होने की उम्मीद है। हालांकि जून महीने का कुल प्रदर्शन सामान्य से काफी कमजोर रहने की संभावना जताई जा रही है। जुलाई और अगस्त में होने वाली वर्षा अब बेहद महत्वपूर्ण होगी। यदि इन महीनों में मॉनसून मजबूत नहीं हुआ तो कृषि, जल संसाधन और अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
आगे क्या है चुनौती
वर्तमान स्थिति देश के लिए एक चेतावनी है। जल संरक्षण, वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और प्रभावी जल प्रबंधन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। आने वाले दिनों में होने वाली बारिश ही तय करेगी कि वर्ष 2026 का मॉनसून केवल कमजोर साबित होगा या फिर देश को बड़े जल और कृषि संकट का सामना करना पड़ेगा।