किशोरों में आत्मघाती प्रवृत्ति बढ़ा रहा 'डिजिटल ड्रग':कार्यशाला में डॉ. आलोक ने बताए बचाव के उपाय
किशोरों और 'जेन-जी' युवाओं में बढ़ते आवेशी मनोविकार तथा आत्मघाती रुझान पर जागरूकता के लिए सहादतगंज स्थित टाइनी टॉट्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल में विशेष कार्यशाला आयोजित की गई। मुख्य वक्ता डॉ. आलोक मनदर्शन ने कहा कि बच्चों में आत्मघाती जोखिम के पीछे 'इम्पल्स कंट्रोल डिसऑर्डर' प्रमुख कारक है, जिसमें डिजिटल लत 'डिजिटल ड्रग' की तरह उत्प्रेरक का काम कर रही है। उन्होंने बताया कि डिजिटल लत के चार चरण होते हैं; चौथे चरण में रोक-टोक करने पर किशोर उग्र या आत्मघाती हो जाते हैं। अत्यधिक डिजिटल एक्सपोजर से दिमाग में डोपामिन बढ़ता है, जिससे भावनात्मक केंद्र (एमिग्डाला) अति सक्रिय और नियंत्रण रखने वाला हिस्सा (प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स) कमजोर हो जाता है। इसके अलावा पारिवारिक कलह, पढ़ाई का दबाव और फ्रेंडशिप-ब्रेकअप भी इसके बड़े ट्रिगर हैं। डॉ. आलोक ने अभिभावकों व शिक्षकों को बच्चों पर मैत्रीपूर्ण नजर रखने, स्वस्थ संवाद बनाने, डिजिटल डिटॉक्स कराने और असामान्य व्यवहार दिखने पर मनोपरामर्श लेने की सलाह दी। निदेशिका बिन्नी सिंह की अध्यक्षता में संपन्न इस सत्र का संयोजन आशा तिवारी और संचालन एकता भूटानी ने किया।
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