ओवैसी बनाम अखिलेश: यूपी में मुस्लिम वोटबैंक की लड़ाई तेज

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में रैलियों के जरिए वे समाजवादी पार्टी के पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे सपा और अखिलेश यादव की रणनीति पर नई चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है।

ओवैसी बनाम अखिलेश: यूपी में मुस्लिम वोटबैंक की लड़ाई तेज

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 1 जुलाई 2026

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच राज्य की राजनीति में एक नया सियासी मुकाबला उभरता दिखाई दे रहा है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। बहराइच से लेकर बिजनौर तक आयोजित रैलियों के जरिए उन्होंने न केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), बल्कि समाजवादी पार्टी (सपा) और उसके अध्यक्ष अखिलेश यादव पर भी सीधा निशाना साधा है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी की सक्रियता का सबसे बड़ा असर समाजवादी पार्टी के पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक पर पड़ सकता है, जो लंबे समय से सपा के साथ जुड़ा रहा है।

पूर्वांचल से पश्चिमी यूपी तक सक्रिय हुए ओवैसी

असदुद्दीन ओवैसी ने अपने मिशन उत्तर प्रदेश की शुरुआत बहराइच जिले की मटेरा विधानसभा सीट से की, जहां गाजी सालार मसूद की दरगाह स्थित है। इसके बाद उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की नजीबाबाद विधानसभा क्षेत्र में बड़ी जनसभा को संबोधित किया।नजीबाबाद में आयोजित रैली में ओवैसी ने कहा कि मुसलमानों को केवल वोटर बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि सत्ता और नेतृत्व में भी अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक दल वर्षों से मुस्लिम समुदाय के वोट तो लेते हैं, लेकिन उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं देते।

अखिलेश यादव और सपा पर सीधा हमला

अपने भाषण में ओवैसी ने समाजवादी पार्टी को निशाने पर लेते हुए कहा कि अखिलेश यादव समाजवाद नहीं बल्कि “यादववाद” की राजनीति करते हैं। उन्होंने दावा किया कि सपा ने मुसलमानों को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया है।ओवैसी ने यह भी कहा कि भाजपा मुसलमानों को टिकट नहीं देती और दूसरी ओर सपा उन्हें नेतृत्व देने से बचती है। ऐसे में मुस्लिम समुदाय को अपनी राजनीतिक ताकत पहचाननी होगी।उनके इन बयानों को सीधे तौर पर अखिलेश यादव के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को चुनौती देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

मुस्लिम बहुल सीटों पर है नजर

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में लगभग 143 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इनमें करीब 73 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है।इन सीटों का बड़ा हिस्सा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में स्थित है। यही कारण है कि ओवैसी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत भी इन्हीं क्षेत्रों से की है।AIMIM का दावा है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में लगभग 200 सीटों पर उम्मीदवार उतार सकती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां मुस्लिम आबादी प्रभावशाली संख्या में है।

सपा की रणनीति और नई चुनौती

समाजवादी पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में ‘पीडीए’ की राजनीति को आगे बढ़ाते हुए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एक मंच पर लाने की कोशिश की है। पार्टी का लक्ष्य मुस्लिम समर्थक दल की छवि से आगे निकलकर व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार करना है।हालांकि, राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इसी रणनीति के कारण सपा कई मुस्लिम मुद्दों पर अपेक्षाकृत सतर्क रुख अपनाती दिखाई देती है। ओवैसी इसी खाली राजनीतिक स्थान को भरने की कोशिश कर रहे हैं।वे मुस्लिम प्रतिनिधित्व, राजनीतिक भागीदारी और समुदाय से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर युवाओं और पारंपरिक मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं।

क्या वोट कटवा साबित होंगे ओवैसी

उत्तर प्रदेश में AIMIM का अब तक का चुनावी रिकॉर्ड बहुत प्रभावशाली नहीं रहा है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन सफलता नहीं मिली। वर्ष 2022 में पार्टी ने लगभग 100 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन अधिकांश उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके।इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ओवैसी का प्रभाव केवल सीट जीतने तक सीमित नहीं है। यदि मुस्लिम बहुल सीटों पर AIMIM उम्मीदवार 10 से 20 हजार वोट भी हासिल कर लेते हैं, तो इससे सपा के चुनावी गणित पर असर पड़ सकता है।बिहार में हुए पिछले चुनावों का उदाहरण देते हुए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि वोटों का बिखराव विपक्षी दलों को नुकसान पहुंचा सकता है।

मुस्लिम युवाओं को साधने की कोशिश

ओवैसी की सबसे बड़ी ताकत उनका आक्रामक और स्पष्ट भाषण शैली मानी जाती है। मुस्लिम युवाओं का एक वर्ग, जो पारंपरिक दलों की राजनीति से निराश बताया जाता है, ओवैसी के बयानों से प्रभावित दिखाई देता है।इसी वजह से AIMIM लगातार उन क्षेत्रों में संगठन मजबूत करने पर जोर दे रही है जहां मुस्लिम आबादी अधिक है और चुनावी मुकाबला करीबी रहता है।

2027 का चुनाव होगा अहम परीक्षा

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से भाजपा को रोकने की रणनीति के तहत समाजवादी पार्टी के पक्ष में एकजुट होते रहे हैं। 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनावों में भी मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा सपा को मिला था।अब सवाल यह है कि क्या असदुद्दीन ओवैसी इस वोटबैंक में वास्तविक सेंध लगा पाएंगे या फिर उनकी सक्रियता केवल चुनावी चर्चा तक सीमित रहेगी। इसका जवाब 2027 के विधानसभा चुनाव में ही स्पष्ट हो सकेगा, लेकिन इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओवैसी बनाम अखिलेश का मुकाबला आने वाले दिनों में और तेज होने वाला है।