एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, आरोपी को भी मिलेगी सुरक्षा!

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोपी को उत्पीड़न से बचाने के लिए कानून में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। याचिका में बिना प्रारंभिक जांच प्राथमिकी और गिरफ्तारी तथा अग्रिम जमानत से जुड़े प्रावधानों पर सवाल उठाए गए थे। कोर्ट ने वर्ष 2020 के अपने फैसले का हवाला देते हुए दोबारा समीक्षा की जरूरत नहीं मानी।

Sep 22, 2026 - 15:26
0
एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, आरोपी को भी मिलेगी सुरक्षा!

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 22 सितंबर 2026

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि कानून में आरोपी को उत्पीड़न से बचाने के लिए भी पर्याप्त उपाय मौजूद हैं। याचिका में बिना प्रारंभिक जांच प्राथमिकी और गिरफ्तारी की व्यवस्था पर सवाल उठाए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से क्यों किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को दोबारा चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोपी को उत्पीड़न से बचाने के लिए कानून में पहले से पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। अदालत ने 2020 में कानून के प्रावधानों को सही ठहराए जाने वाले अपने फैसले का भी उल्लेख किया।

याचिकाकर्ता ने किन प्रावधानों पर उठाए सवाल?

याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि बिना प्रारंभिक जांच के प्राथमिकी दर्ज करने और आरोपी की गिरफ्तारी की व्यवस्था से कानून के दुरुपयोग की आशंका रहती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी के अधिकारों पर भी विचार किया जाना चाहिए।दलील में यह भी कहा गया कि कानून की धारा 18 के कारण आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ नहीं मिल पाता। याचिकाकर्ता की ओर से इन प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर फिर से विचार करने की मांग की गई थी।

मुआवजे की व्यवस्था पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने शिकायतकर्ता को मुकदमे की शुरुआत में ही मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाया। उन्होंने राज्यसभा में दी गई जानकारी का हवाला देते हुए मुआवजे की राशि को लेकर अपनी दलील रखी।इस पर पीठ ने दलील पर आपत्ति जताई और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने इसे ‘क्रूर’ टिप्पणी के रूप में संबोधित किया। अदालत ने इस आधार पर कानून की वैधता पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं मानी।

2018 में भी सामने आया था यह मामला

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के सख्त प्रावधानों को लेकर वर्ष 2018 में भी सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण मामला सामने आया था। उस समय अदालत ने गिरफ्तारी और प्राथमिकी से पहले कुछ सुरक्षा उपायों की बात कही थी।इसके बाद इस फैसले को लेकर व्यापक विरोध हुआ और संसद ने कानून में संशोधन करते हुए धारा 18क जोड़ी। संशोधन में स्पष्ट किया गया कि प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच आवश्यक नहीं होगी और गिरफ्तारी के लिए पहले से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी।

2020 के फैसले का सुप्रीम कोर्ट ने दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा मामले में अपने वर्ष 2020 के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में अदालत ने कानून में किए गए संशोधनों को सही माना था। इसी कारण पीठ ने केवल छह साल बाद उसी मुद्दे पर दोबारा समीक्षा करने की आवश्यकता नहीं मानी।अदालत की टिप्पणी का केंद्र यह था कि कानून में आरोपी के उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए भी न्यायिक उपाय मौजूद हैं। इसलिए मौजूदा याचिका के आधार पर कानून के प्रावधानों की दोबारा संवैधानिक समीक्षा करने से अदालत ने इनकार कर दिया।

एससी-एसटी कानून में क्या है धारा 18क का प्रावधान

धारा 18क को वर्ष 2018 में कानून में जोड़ा गया था। इसके तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच को अनिवार्य नहीं रखा गया। साथ ही गिरफ्तारी के लिए किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता भी नहीं रखी गई।हालांकि, न्यायालयों ने अलग-अलग मामलों में यह स्पष्ट किया है कि केवल किसी व्यक्ति के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने मात्र से हर विवाद या अपमान इस कानून के तहत अपराध नहीं बन जाता। आरोप में कानून के आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है।

कानून की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

मौजूदा सुनवाई में पीठ ने कानून की संवैधानिक वैधता पर दोबारा विचार करने से इनकार किया है। अदालत ने पहले दिए गए फैसले और आरोपी के लिए कानून में उपलब्ध सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखा।इस मामले में अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से रखी गई दलीलों को स्वीकार करते हुए कानून के प्रावधानों में कोई नया बदलाव नहीं किया। इसलिए फिलहाल कानून में प्राथमिकी और गिरफ्तारी से जुड़े मौजूदा प्रावधान प्रभावी हैं।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User