एसआईआर विवाद पर भाजपा का पलटवार, संबित पात्रा ने विपक्ष पर साधा निशाना
एसआईआर और चुनाव आयोग को लेकर जारी विवाद के बीच भाजपा सांसद संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि चुनावी हार के बाद विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठा रहा है। वहीं, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर समेत उसके प्रमुख फैसले सभी सदस्यों की सहमति से लिए गए हैं।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 23 सितंबर 2026
एसआईआर और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर चल रहे विवाद के बीच भाजपा सांसद संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि चुनावों में हार के बाद विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठा रहा है। वहीं, चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके महत्वपूर्ण फैसले सभी सदस्यों की सहमति से लिए गए हैं।
एसआईआर विवाद पर भाजपा की पहली प्रतिक्रिया
विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच भाजपा ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा सांसद संबित पात्रा ने प्रेस वार्ता में विपक्ष के आरोपों पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनावी हार के बाद संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को लेकर चल रही बहस को उसके पूरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
संबित पात्रा ने कहा कि चुनाव आयुक्तों के बीच विचार-विमर्श होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उनके अनुसार, आयोग के सदस्यों के बीच बातचीत और सुझावों का आदान-प्रदान अपने आप में किसी असहमति का प्रमाण नहीं है। चुनाव आयोग भी कह चुका है कि अलग-अलग राय और टिप्पणियां संस्थागत विचार-विमर्श की सामान्य प्रक्रिया हैं।
'मैं चुनाव आयोग की ओर से प्रेस वार्ता नहीं कर रहा'
संबित पात्रा ने स्पष्ट किया कि वह चुनाव आयोग की ओर से प्रेस वार्ता नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने आयोग की ओर से जारी स्पष्टीकरण पढ़ा है और उसी के आधार पर अपनी बात रख रहे हैं। उनके मुताबिक, आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर से जुड़े अंतिम फैसले सभी सदस्यों की सहमति से लिए गए।
चुनाव आयोग के अनुसार, लिखित टिप्पणियां, सुझाव, तकनीकी सलाह और आंतरिक जांच-पड़ताल उसकी नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। आयोग ने कहा है कि अंतिम फैसलों और आंतरिक विचार-विमर्श के बीच अंतर किया जाना चाहिए।
विपक्ष के 'वोट चोरी' के आरोपों पर भी बोले पात्रा
भाजपा सांसद ने विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे मतदाता सूची और कथित 'वोट चोरी' से जुड़े आरोपों का भी जिक्र किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में सबसे अधिक नाम हटाए जाने की बात कही जा रही है, वहां अलग-अलग दलों के चुनावी परिणाम भी सामने आए हैं।
हालांकि, ये आंकड़े और उनके आधार पर निकाले गए राजनीतिक निष्कर्ष पात्रा के बयान का हिस्सा हैं। इन्हें चुनाव आयोग या किसी स्वतंत्र जांच की ओर से स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जा सकता। एसआईआर को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं।
क्या है पूरा एसआईआर विवाद?
एसआईआर को लेकर विवाद उस रिपोर्ट के बाद तेज हुआ जिसमें दावा किया गया कि निर्वाचन आयोग के दो सदस्यों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर कई लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में मतदाता नाम जोड़ने, हटाने, प्रपत्रों में बदलाव और आंकड़ों से संबंधित विषयों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, आयोग से जुड़े अधिकारियों ने इन खबरों में बताए गए मतभेद के अर्थ को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि एसआईआर सहित उसके प्रमुख फैसले पूर्ण आयोग की सहमति से लिए गए हैं।
चुनाव आयोग ने कहा- अलग-अलग राय सामान्य प्रक्रिया
चुनाव आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि किसी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग सुझाव या टिप्पणियां सामने आना सामान्य बात है। आयोग के मुताबिक, मसौदा तैयार करने के दौरान सदस्य परिचालन संबंधी सवाल उठा सकते हैं और सुधार के सुझाव दे सकते हैं। इसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को बेहतर बनाना और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करना है। आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक वर्ष के दौरान लिए गए प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। एसआईआर को लेकर भी आयोग ने यही रुख दोहराया है। इस तरह भाजपा और चुनाव आयोग का मौजूदा पक्ष विपक्ष द्वारा उठाए गए आंतरिक मतभेद के आरोपों से अलग है।
एसआईआर को लेकर राजनीतिक टकराव जारी
एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्षी दल आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े सवाल उठा रहे हैं, जबकि भाजपा ने इन आरोपों को राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में पेश किया है।इस पूरे विवाद में एक ओर चुनाव आयोग अपने फैसलों को वैधानिक और सर्वसम्मत बता रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रकाशित रिपोर्टों में आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियों का उल्लेख किया गया है। इसलिए दोनों पक्षों के दावों और उपलब्ध दस्तावेजों को अलग-अलग समझना महत्वपूर्ण है।
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