धनतेरस पर क्यों खरीदी जाती है झाडू? जानिए:कानपुर में नेपाल की फूल-झाडू की डिमांड, इंडोनेशिया से आती हैं नारियल पत्ते की तीलियां
कानपुर में धनतेरस के दिन झाडू की खरीदारी के लिए भी भी बजारें सजी हैं, शहर की सबसे बड़ी थोक बजार में 2 महीनें से झाडू बनाने की शुरूआत कर दी गई थी। मान्यता है कि धनतेरस पर झाड़ू खरीदने से घर में सुख-समृद्धि आती है और दरिद्रता दूर होती है। यही वजह है कि बाजारों में कई तरह की झाडू बिक्री के लिए नजर आ रही हैं। शहर के अफीमकोठी चौराहे पर झाड़ू का बड़ा थोक बाजार है। यहां करीब 15 दुकानें हैं, जहां फूल झाड़ू, खजूर के कूंचे और नारियल सींक की झाड़ू समेत करीब 15 तरह के डिजाइन की झाडू बिक रहीं हैं। बाजार में 40 रुपए से लेकर 200 रुपए तक की झाड़ू बिक रही हैं। इनमें नेपाल से बनकर आई फूल झाड़ू की सबसे ज्यादा डिमांड है। दैनिक भास्कर ने धनतेरस पर झाड़ू के कारोबार, इसकी अलग-अलग किस्मों और इसे खरीदने की धार्मिक मान्यता को लेकर कारोबारियों और कर्मकांड विशेषज्ञों से बातचीत की। पढ़िए इस रिपोर्ट में… 2 महीने पहले से शुरू हो जाती है झाड़ू बनाने की तैयारी अफीमकोठी चौराहे पर झाड़ू का कारोबार करने वाले इसरार अली ने बताया कि उनका परिवार 5 पीढ़ियों से इस कारोबार से जुड़ा है। पिछले करीब 15 सालों में धनतेरस पर झाड़ू खरीदने का चलन काफी बढ़ा है। उन्होंने बताया कि धनतेरस पर मांग इतनी बढ़ जाती है कि फूल झाड़ू, कूंचे और नारियल सींक की झाड़ू तैयार करने का काम 2 महीने पहले से शुरू करना पड़ता है। कारीगर दिन-रात मेहनत करके झाड़ू तैयार करते हैं। यहां थोक बाजार होने की वजह से शहर के अलग-अलग इलाकों में झाड़ू बेचने वाले दुकानदार भी यहीं से खरीदारी करते हैं। नेपाल की फूल झाड़ू की सबसे ज्यादा डिमांड इसरार के मुताबिक, बाजार में इस समय नेपाल से आई फूल झाड़ू सबसे ज्यादा पसंद की जा रही है। इसकी खासियत है कि इसकी घास मुलायम होती है और जल्दी घिसती नहीं है। लंबे समय तक इस्तेमाल करने के बाद भी इसकी घास आसानी से खत्म नहीं होती। वहीं, असम की घास से तैयार फूल झाड़ू में लकड़ी निकलने की समस्या रहती है। यह ज्यादा समय तक नहीं चलती। इसी वजह से ग्राहक नेपाल की झाड़ू को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसकी कीमत 150 से 200 रुपए तक है। नारियल के पत्तों और खजूर की पत्तियों से भी बनती है झाड़ू बाजार में फूल झाड़ू के अलावा नारियल सींक और खजूर की पत्तियों से बनी झाड़ू भी बिक रही हैं। नारियल सींक की झाड़ू: इसे नारियल के पेड़ के पत्तों से तैयार किया जाता है। पत्ते से एक-एक सींक निकालकर उन्हें जोड़कर झाड़ू बनाई जाती है। इसके लिए मैंगलोर, कर्नाटक और इंडोनेशिया से कच्चा माल आता है। खजूर की झाड़ू (कूंचा): इसे खजूर के पेड़ की पत्तियों से तैयार किया जाता है। इसके लिए महोबा से कच्चा माल मंगाया जाता है। इसमें भी कई तरह के डिजाइन बनाए जाते हैं। झाड़ू बनाने वाली महिला सम्मों ने बताया कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से इसी कारोबार में लगा है। बचपन से ही वह अपने परिवार के साथ झाड़ू बनाने का काम कर रहे हैं। धनतेरस पर बिक्री बढ़ने के कारण कई महीने पहले से तैयारी शुरू करनी पड़ती है। साफ-सफाई से प्रसन्न होती हैं मां लक्ष्मी, इसलिए झाड़ू खरीदने की मान्यता कर्मकांड विशेषज्ञ हरिनारायण दीक्षित ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां लक्ष्मी हमेशा साफ-सुथरी जगह पर ही वास करती हैं। झाड़ू का इस्तेमाल घर की गंदगी दूर करने और स्वच्छता बनाए रखने के लिए किया जाता है। इसी कारण धनतेरस पर झाड़ू खरीदना शुभ माना जाता है। उन्होंने बताया कि धनतेरस भगवान धन्वंतरि का दिन है। इस दिन लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोना-चांदी, बर्तन या दूसरी नई चीजें खरीदते हैं। जिन लोगों के लिए महंगी चीजें खरीदना संभव नहीं होता, वे झाड़ू खरीदते हैं। इसे घर में स्वच्छता और दरिद्रता दूर करने का प्रतीक माना जाता है। समुद्र मंथन से भी जुड़ी है झाड़ू खरीदने की मान्यता धार्मिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब धन की देवी मां लक्ष्मी प्रकट हुईं, तो उनके साथ दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी का भी आगमन हुआ था। मान्यता है कि अलक्ष्मी को गंदगी, आलस्य और नकारात्मकता प्रिय है, जबकि मां लक्ष्मी को साफ-सफाई और स्वच्छता पसंद है। इसलिए धनतेरस पर झाड़ू खरीदकर घर की सफाई की जाती है, ताकि घर से नकारात्मकता और दरिद्रता दूर हो और मां लक्ष्मी का स्वागत किया जा सके। धनतेरस पर हर दुकान पर बिकती है झाड़ू थोक बाजार से झाड़ू खरीदने पहुंचे फुटकर दुकानदार ऋषि सोनकर ने बताया कि धनतेरस पर बाजार में चाहे किसी भी सामान की दुकान लगाई जाए, उसमें झाड़ू जरूर रखी जाती है। इस दिन झाड़ू की बिक्री अच्छी होती है। यही वजह है कि धनतेरस के बाजार में खरीदारी करने निकलने वाले लोगों के हाथों में झाड़ू भी नजर आती है।
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