2027 जीतने के लिए BJP 10 हजार नेताओं को मनाएगी:यूपी के कई जिलों में सांसद-विधायकों में ‘जंग’; अपनों की नाराजगी दूर करने की रणनीति
भाजपा के लिए सांसद-विधायक और कार्यकर्ताओं की आपसी नाराजगी ‘सिरदर्द’ बन गई है। यूपी में ऐसे 10 हजार से ज्यादा बड़े नेता हैं, जिनकी अपने इलाकों में अच्छी पकड़ है, मगर वो एक साथ मिलकर काम नहीं करना चाहते हैं। सिर्फ 3 महीने बाद ही विधानसभा चुनाव हैं, ऐसे में भाजपा इन नेताओं की नाराजगी का रिस्क नहीं लेना चाहती है। गृहमंत्री अमित शाह भी ये समझ चुके हैं। उन्होंने 30 अक्टूबर को लखनऊ में कहा- आप लोगों के मन में जो भी निराशा या नाराजगी है, उसे यहां से जाते समय गोमती नदी में डालकर जाइए। हमें एकजुट रहना है। अब पुराने कार्यकर्ताओं को मनाने के लिए 2 स्ट्रैटेजी पर काम हो रहा है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह नाराज सांसद-विधायकों और पदाधिकारियों तक पहुंच रहे हैं। साथ ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पदाधिकारी भी इन नाराज नेताओं को पार्टी लाइन पर काम करने के लिए समझा रहे हैं। यूपी की हर विधानसभा में ऐसे 25-25 लोगों की लिस्ट बना ली गई है, जो पहले पार्टी के अहम पदों पर रहे हैं, लेकिन नाराजगी की वजह से लंबे समय से एक्टिव नहीं हैं। ये खींचतान 3 तरह की चल रही है- 1. कई जिलों में सांसद, विधायक की बन नहीं रही है।
2. विधायक और निकाय अध्यक्ष की ठनी हुई है।
3. विधायक और जिलाध्यक्ष के बीच विवाद है। 2027 से पहले विपक्ष जिस तरह से एकजुट हो रहा है, अगर इन नेताओं के बीच के मतभेद दूर नहीं हुए, तो विधानसभा चुनाव में चुनौती बढ़ सकती है। पहले ये समझते हैं कि ये विवाद सामने कैसे आए… भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह 17 सितंबर से हर जिले में पहुंच रहे हैं। गोरक्ष, पश्चिम, ब्रज, कानपुर-बुंदेलखंड, अवध, काशी क्षेत्र में संपर्क अभियान चलाया जा रहा है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, जिन जिलों में प्रदेश प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष पहुंच रहे हैं, वहां उन्हें कार्यकर्ताओं में उत्साह से ज्यादा पार्टी के नेताओं के बीच आपसी खींचतान ज्यादा दिख रही है। कहीं ब्लॉक प्रमुख और नगर पालिका अध्यक्ष एक दूसरे को देखना पसंद नहीं कर रहे। कहीं सांसद और विधायक एक दूसरे के खिलाफ काम कर रहे हैं। कई जिला पंचायत अध्यक्ष ही सांसद-विधायक को सपोर्ट नहीं कर रहे हैं। पश्चिम से पूरब तक...‘मान-सम्मान’ के नाम पर छिड़ी जंग को समझिए- फतेहपुर सीकरी (आगरा) - यहां 2 तरह की खींचतान दिख रही है- 1. विधायक बाबूलाल की सांसद राजकुमार से नहीं बन रही चौधरी बाबूलाल 2014 में फतेहपुर सीकरी से सांसद रहे थे। साल 2009 के चुनाव में जब बाबूलाल का टिकट कटा तो पार्टी ने राजकुमार चाहर को उम्मीदवार बनाया था, तभी से दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता चली आ रही है। जो अभी तक सुलझी नहीं है। 2. बाह विधायक रानी पक्षालिका सिंह की सांसद राजकुमार चाहर से ठनी बाह विधानसभा क्षेत्र में भदावर राजघराने से ताल्लुक रखने वाली विधायक रानी पक्षालिका सिंह और सांसद राजकुमार चाहर के बीच टकराव मुख्य रूप से वर्चस्व और श्रेय की राजनीति से जुड़ा है। बाह क्षेत्र में होने वाली सरकारी योजनाओं (जैसे सड़कें, पुल और राजकीय महाविद्यालय का शिलान्यास) को लेकर दोनों नेता अपनी-अपनी उपलब्धि बताते हैं। बुलंदशहर - सांसद-विधायक की नहीं बन रही डॉ. भोला सिंह लगातार तीसरी बार सांसद चुने गए हैं और संगठन में राष्ट्रीय मंत्री की भूमिका में हैं। दूसरी ओर, सदर विधायक प्रदीप चौधरी और डिबाई विधायक चंद्रपाल सिंह अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत जनसमर्थन और पकड़ रखते हैं। दोनों गुट अपने-अपने क्षेत्र में 'समानांतर शक्ति केंद्र' के रूप में काम करते हैं, इससे राजनीतिक वर्चस्व को लेकर टकराव रहता है। गौतमबुद्धनगर- सांसद, विधायक में डेवलपमेंट का श्रेय लेने की होड़ गौतमबुद्धनगर में भाजपा के सांसद डॉ. महेश शर्मा और जेवर से भाजपा विधायक धीरेंद्र सिंह के बीच की सियासी दूरियां कई वजहों से रही हैं। डॉ. महेश शर्मा लंबे समय से गौतमबुद्धनगर के सबसे प्रभावशाली नेता माने जाते रहे हैं। दूसरी ओर, धीरेंद्र सिंह जेवर विधानसभा में लोकप्रिय हैं। उनका दायरा धीरे-धीरे पूरे गौतमबुद्धनगर जिले में बढ़ रहा है। श्रेय लेने की होड़ में दोनों के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। मुजफ्फरनगर- चुनाव हराने के लिए काम करने के आरोप पूर्व सांसद संजीव बालियान और सरधना के पूर्व विधायक संगीत सोम के बीच की जंग अब सरेआम है। बालियान का आरोप है कि सोम ने लोकसभा में उनका खेल बिगाड़ा, तो अब बालियान संगीत सोम की राह में कांटे बिछा रहे हैं। मुजफ्फरनगर और सरधना की यह जंग 2022 और 2024 के चुनावी नतीजों, क्षेत्रीय जातीय ध्रुवीकरण (जाट-ठाकुर समीकरण) और संगठन के भीतर अपनी राजनीतिक साख बचाने की होड़ से उपजी है। सहारनपुर- आरोप लोकसभा चुनाव में सपोर्ट नहीं किया योगी सरकार के मंत्री ब्रजेश सिंह और 2024 के प्रत्याशी रहे राघव लखनपाल शर्मा आपस में उलझे हैं। राघव लखनपाल समर्थक गुट का मानना था कि राजपूत बहुल क्षेत्रों और मंत्री के प्रभाव वाले इलाकों में जिस स्तर पर मतदान पार्टी के पक्ष में होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। वहीं, मंत्री समर्थकों का तर्क रहा कि देवबंद सीट से राघव लखनपाल को बढ़त दिलाकर उन्होंने अपना चुनावी धर्म निभाया था। कैराना - विधायक के खिलाफ ही चुनाव लड़ने का दावा कैराना से पूर्व प्रत्याशी प्रदीप चौधरी और गंगोह विधायक कीरथ सिंह का विवाद इतना बढ़ गया है कि प्रदीप चौधरी अब खुद गंगोह सीट से दावेदारी ठोक रहे हैं। पीलीभीत - श्रेय लेने की होड़ में राज्यमंत्री और पालिका अध्यक्ष आमने-सामने राज्यमंत्री संजय सिंह गंगवार और नगर पालिका अध्यक्ष आस्था अग्रवाल के बीच वर्चस्व की रस्साकशी जारी है। पीलीभीत नगर पालिका में यह विवाद शहर के विकास कार्यों के प्रशासनिक नियंत्रण, टेंडर प्रक्रिया और पीलीभीत नगर क्षेत्र में अपना राजनीतिक प्रभाव सर्वोपरि बनाए रखने की होड़ चल रही है। अब कुछ और जिलों में चल रहे विवाद जानिए- नाराजगी के कई कारण, इन्हें भी जानिए भाजपा सोर्स कहते हैं कि ज्यादातर सीटों पर सांसद या विधायक खुद का दबदबा चाहते हैं। डेवलपमेंट के लिए जो बजट अलॉट होता है, उसको जारी कराने का श्रेय मिले, इसके लिए खुद को दूसरे नेताओं से ऊपर दिखाते हैं। संगठन के अंदर अपने समर्थकों और करीबियों को पद दिलाने के लिए भी खींचतान मची हुई है। पार्टी के अंदर जातिगत टेंशन भी दिख रही है। कहीं जाट और ठाकुर आमने-सामने हैं, तो कहीं ब्राह्मण और ठाकुर या कुर्मी और ठाकुर के बीच झगड़े हैं। पार्टी में पुराने नेता अभी भी नए चेहरों के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। बाहर से आने वाले चेहरों को भी स्वीकार नहीं किया जा रहा है। जो लोकसभा चुनाव हारे, वो बदला लेने की तैयारी कर रहे भाजपा को सबसे बड़ी टेंशन 2024 के लोकसभा चुनाव में हुई भितरघात को लेकर है। उस चुनाव में हार चुके पूर्व सांसद और मौजूदा सांसद अब अपनी ही पार्टी के विधायकों के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं। कई नेताओं का आरोप है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी के कुछ विधायकों ने अपने ही उम्मीदवारों को हराने या कमजोर करने का काम किया था। लोकसभा चुनाव हार चुके प्रत्याशी और मौजूदा सांसद विधानसभा चुनाव में इन विधायकों का टिकट कटवाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए कई सांसद दिल्ली और लखनऊ तक दौड़ लगा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर इन विधायकों को दोबारा टिकट दिया गया, तो पार्टी को सीट गंवानी पड़ सकती है। 25-25 रूठों को मनाने वाली रणनीति का सहारा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी का मानना है कि अगर निचले स्तर के कार्यकर्ता का मनोबल बढ़ा दिया जाए, तो वह चुनाव का पासा पलट सकता है। इसलिए हर विधानसभा से 25 ऐसे पूर्व दमदार कार्यकर्ताओं की सूची बनाई जा रही है, जो नाराज होकर किनारे बैठ गए हैं। आरएसएस के कैडर को भी इन्हीं कार्यकर्ताओं के घर भेजकर 'अपनत्व' का अहसास कराया जाएगा। --------------------- ये खबर भी पढें…. धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर भाजपा चुप क्यों:अखिलेश आक्रामक, सनातनी छवि दिखाने की वजह क्या है? हिंदू और सनातन पर हुई किसी भी विवादित टिप्पणी पर भाजपा हमेशा बहुत एग्रेसिव रहती थी। जबकि, अखिलेश यादव और सपा उन बयानों पर बहुत ज्यादा बात नहीं करती थी। लेकिन, इस बार उल्टा हो रहा है। दोनों पार्टियों के इस ‘बदले हुए राजनीतिक व्यवहार’ की वजह पढ़िए…
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