बसपा का होगा सफाया? राज्यसभा के बाद चारों सदनों में शून्य!

उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है। बसपा के मौजूदा राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। पार्टी के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में कोई विधायक नहीं है और लोकसभा तथा विधान परिषद में भी उसका प्रतिनिधित्व नहीं है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव के बाद बसपा का चारों सदनों में प्रतिनिधित्व शून्य होने की स्थिति बन सकती है।

Sep 22, 2026 - 13:58
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बसपा का होगा सफाया? राज्यसभा के बाद चारों सदनों में शून्य!

दि राइजिंग न्यूज़ | लखनऊ | 22 सितंबर 2026

बहुजन समाज पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ी चुनौती सामने है। राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को होने वाले चुनाव के बाद पार्टी के पास संसद के उच्च सदन में भी कोई प्रतिनिधि नहीं रह सकता है। फिलहाल बसपा के पास राज्यसभा में रामजी गौतम एकमात्र सांसद हैं, जिनका कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त होना है।

उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर चुनाव

निर्वाचन आयोग ने उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया है। इन सीटों पर 16 अक्टूबर 2026 को मतदान कराया जाएगा। चुनाव प्रक्रिया 29 सितंबर से शुरू होगी और प्रत्याशी 6 अक्टूबर तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे। इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त होना है। इन 10 सीटों में भारतीय जनता पार्टी के आठ सदस्यों के अलावा समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव और बहुजन समाज पार्टी के रामजी गौतम की सीट शामिल है। राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के विधायक मतदान करते हैं। ऐसे में किसी उम्मीदवार के लिए पर्याप्त विधायक समर्थन होना चुनाव जीतने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।

राज्यसभा में बसपा के पास फिलहाल एक ही सदस्य

बहुजन समाज पार्टी के पास इस समय राज्यसभा में केवल रामजी गौतम का प्रतिनिधित्व है। उनका कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को पूरा होने वाला है। मौजूदा विधानसभा में बसपा के पास कोई विधायक नहीं है, इसलिए पार्टी के पास अपने उम्मीदवार को राज्यसभा भेजने के लिए आवश्यक संख्याबल मौजूद नहीं है।ऐसी स्थिति में यदि किसी दूसरे दल के विधायक बसपा उम्मीदवार का समर्थन नहीं करते हैं, तो चुनाव के बाद राज्यसभा में भी बसपा का प्रतिनिधित्व समाप्त हो सकता है। इसका अर्थ होगा कि उत्तर प्रदेश से जुड़े चारों प्रमुख सदनों—लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद—में बसपा का कोई सदस्य नहीं रहेगा।

लोकसभा में भी बसपा का नहीं खुला खाता

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश समेत देशभर में बसपा को एक भी लोकसभा सीट हासिल नहीं हुई थी। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव हुआ था और बसपा किसी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने उत्तर प्रदेश में 10 सीटें जीती थीं। पांच साल बाद 2024 में पार्टी का लोकसभा प्रतिनिधित्व पूरी तरह समाप्त हो गया। अब राज्यसभा की एकमात्र सीट का कार्यकाल पूरा होने के बाद संसद में भी बसपा की मौजूदगी खत्म होने की स्थिति बन रही है।

विधानसभा और विधान परिषद में भी प्रतिनिधित्व नहीं

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में बसपा केवल एक सीट जीत सकी थी। बलिया से उमाशंकर सिंह पार्टी के एकमात्र विधायक बने थे, लेकिन उनके निधन के बाद विधानसभा में बसपा का कोई विधायक नहीं रह गया। इस तरह राज्य की विधानसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया।विधान परिषद में भी बसपा का कोई सदस्य नहीं है। ऐसे में राज्यसभा की मौजूदा सीट भी समाप्त होने पर पार्टी चारों सदनों में शून्य प्रतिनिधित्व की स्थिति में पहुंच सकती है। यह स्थिति बसपा के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण बदलाव मानी जा रही है।

कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता में रही थी बसपा

बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कांशीराम ने 14 अप्रैल 1984 को की थी। इसके बाद पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में तेजी से अपना आधार मजबूत किया और दलित, पिछड़े तथा अन्य सामाजिक समूहों के बीच संगठन खड़ा किया। 1989 में बसपा के कई विधायक पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे थे।2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। पार्टी ने उस चुनाव में 206 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और उसका विधानसभा प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया।

2012 के बाद लगातार घटा चुनावी प्रतिनिधित्व

2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा 80 सीटों पर सिमट गई थी। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी उत्तर प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत सकी। 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 19 सीटें मिलीं, जबकि 2022 में पार्टी केवल एक सीट पर सिमट गई।2024 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा अपना खाता नहीं खोल सकी। निर्वाचन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 80 सीटों पर मतदान हुआ था।

वोट प्रतिशत रहा, लेकिन सीट में नहीं बदल सका

2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा को उत्तर प्रदेश में उल्लेखनीय संख्या में मत मिले, लेकिन पार्टी किसी लोकसभा सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। इससे पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मत आधार को दोबारा चुनावी जीत में बदलने की बनी हुई है।पार्टी के लिए आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी महत्वपूर्ण होंगे। बसपा को अपने संगठन, कार्यकर्ताओं और पारंपरिक मतदाताओं के बीच फिर से प्रभाव मजबूत करने की चुनौती का सामना करना होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों ने बताई अलग-अलग वजहें

वरिष्ठ पत्रकारों के विश्लेषण के अनुसार बसपा की मौजूदा स्थिति के पीछे पार्टी की राजनीतिक सक्रियता और संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मायावती की सार्वजनिक और जमीनी राजनीतिक गतिविधियां पिछले वर्षों में अन्य प्रमुख नेताओं की तुलना में सीमित रही हैं।वहीं, बसपा के संगठन और कांशीराम के दौर में तैयार किए गए सामाजिक आधार को पार्टी की महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी माना जाता है। विश्लेषकों के अनुसार आने वाले विधानसभा चुनाव में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी अपने पारंपरिक मत आधार को कितनी प्रभावी तरीके से चुनावी समर्थन में बदल पाती है।

कई राज्यों में रहा है बसपा का प्रभाव

बसपा का राजनीतिक विस्तार केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहा है। पार्टी ने उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी संगठन खड़ा किया और चुनावों में हिस्सा लिया है।हालांकि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी का चुनावी प्रतिनिधित्व कई राज्यों में घटा है। अब उत्तर प्रदेश में भी चारों प्रमुख सदनों में संभावित शून्य प्रतिनिधित्व बसपा के सामने संगठन और राजनीतिक प्रभाव को फिर से मजबूत करने की बड़ी चुनौती को सामने रखता है।

आगे क्या होगा

16 अक्टूबर को होने वाला राज्यसभा चुनाव बसपा के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव होगा। यदि पार्टी अपने उम्मीदवार के लिए आवश्यक विधायक समर्थन हासिल नहीं कर पाती है और रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त हो जाता है, तो राज्यसभा में भी उसका प्रतिनिधित्व खत्म हो जाएगा। इसके बाद उत्तर प्रदेश की लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद—चारों सदनों में बसपा का कोई सदस्य नहीं रहेगा। हालांकि यह स्थिति चुनाव परिणाम और राज्यसभा चुनाव में सामने आने वाले राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगी।

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