ब्रिक्स में क्यों फंसा साझा बयान

नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले साझा घोषणापत्र को लेकर चुनौती बढ़ गई है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव, सऊदी अरब का रक्षा समझौता और आतंकवाद का मुद्दा सदस्य देशों के बीच सहमति में बाधा बन सकता है। सर्वसम्मति की व्यवस्था के कारण किसी एक देश की आपत्ति भी घोषणापत्र रोक सकती है।

Sep 11, 2026 - 16:52
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ब्रिक्स में क्यों फंसा साझा बयान

दि राइजिंग न्यूज | नई दिल्ली | 11 सितंबर 2026

नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि क्या सभी सदस्य देश एक साझा घोषणापत्र पर सहमत हो पाएंगे। भारत इस सम्मेलन का मेजबान है और उसकी कोशिश है कि सभी 11 सदस्य देशों की सहमति से दिल्ली घोषणापत्र जारी किया जाए। हालांकि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और सदस्य देशों के बीच बढ़ते मतभेद इस रास्ते में बड़ी चुनौती बन सकते हैं।ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच बढ़ा तनाव इस समय सबसे बड़ी अड़चन माना जा रहा है। सऊदी अरब से जुड़े नए सुरक्षा समझौते ने भी परिस्थितियों को और जटिल बना दिया है। इसके अलावा भारत चाहता है कि आतंकवाद और सीमा पार आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भी साझा दस्तावेज में स्पष्ट भाषा शामिल हो। ऐसे में अंतिम सहमति तक पहुंचने के लिए सदस्य देशों के बीच लंबी बातचीत की संभावना है।

साझा घोषणापत्र क्या होता है और क्यों है इतना महत्वपूर्ण

साझा घोषणापत्र ऐसा सार्वजनिक दस्तावेज होता है, जिसे कई देश आपसी सहमति से जारी करते हैं। इसमें उन प्रमुख मुद्दों और विषयों का उल्लेख किया जाता है, जिन पर सभी सदस्य देशों की एक राय बनी हो। यह किसी कानूनी समझौते की तरह बाध्यकारी नहीं होता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसका महत्व काफी अधिक माना जाता है। इससे दुनिया को यह संदेश मिलता है कि संबंधित देशों ने किन विषयों पर साझा रुख अपनाया है।साझा घोषणापत्र तैयार करने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। विदेश मंत्रालयों के अधिकारी, राजनयिक प्रतिनिधि और संबंधित देशों के वार्ताकार पहले दस्तावेज का प्रारूप तैयार करते हैं। इसके बाद प्रत्येक देश उसमें अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार बदलाव की मांग करता है। कई बार किसी एक शब्द को लेकर भी लंबी बातचीत होती है, क्योंकि किसी कार्रवाई की निंदा करने और केवल चिंता जताने के बीच राजनीतिक संदेश में बड़ा अंतर हो सकता है।

पहली बड़ी रुकावट: ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव

ब्रिक्स के साझा घोषणापत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच जारी तनाव को माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्ष बढ़ने के बाद दोनों देशों के रुख में काफी अंतर आया है। ईरान चाहता है कि प्रस्तावित घोषणापत्र में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई का स्पष्ट उल्लेख किया जाए और उसकी निंदा की जाए।दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात चाहता है कि उसके क्षेत्र पर ईरान की ओर से किए गए हमलों को भी स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए। संयुक्त अरब अमीरात का आरोप है कि उसके क्षेत्र को निशाना बनाकर ईरान ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया। वहीं ईरान का आरोप है कि संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिका और इजरायल को सैन्य सुविधाएं, हवाई क्षेत्र तथा खुफिया सहयोग उपलब्ध कराया।इन विरोधी रुखों के कारण किसी ऐसी भाषा पर सहमति बनाना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिसमें किसी एक पक्ष को सीधे दोषी ठहराए बिना सभी देशों की चिंताओं को शामिल किया जा सके। भारत कथित तौर पर ऐसी भाषा पर जोर दे रहा है जिसमें बिना किसी देश का नाम लिए अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र और बिना उकसावे के सैन्य कार्रवाई जैसे सिद्धांतों का उल्लेख किया जाए।

दूसरी बड़ी रुकावट: मक्का रक्षा समझौते ने बढ़ाई चिंता

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच अगस्त 2026 में हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता भी ब्रिक्स के भीतर चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। इस समझौते में यह व्यवस्था बताई गई है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति को सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय मामलों के कई जानकार इसकी तुलना उत्तर अटलांटिक संधि संगठन की सामूहिक रक्षा व्यवस्था से कर रहे हैं।इस समझौते के तहत सऊदी अरब में स्थायी सचिवालय बनाए जाने की योजना बताई गई है। सऊदी अरब आर्थिक संसाधन और स्थान उपलब्ध कराने की भूमिका में है, जबकि तुर्किये आधुनिक सैन्य तकनीक और पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता के साथ इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस व्यवस्था को लेकर ईरान की चिंता इसलिए बढ़ सकती है क्योंकि सऊदी अरब और ईरान के बीच क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर पहले से ही प्रतिस्पर्धा रही है।सऊदी अरब का ब्रिक्स से जुड़ाव इस पूरे मामले को और महत्वपूर्ण बना देता है। यदि मक्का रक्षा समझौते को लेकर ईरान ने आपत्ति जताई और सऊदी अरब ने उसका विरोध किया, तो साझा घोषणापत्र पर सहमति बनाने में नई मुश्किल पैदा हो सकती है। हालांकि ईरान को भविष्य में इस व्यवस्था से जोड़ने को लेकर चर्चाएं सामने आई हैं, लेकिन अभी इसे निश्चित निर्णय नहीं माना जा सकता।

तीसरी बड़ी रुकावट: आतंकवाद और सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा

ब्रिक्स सम्मेलन में आतंकवाद का मुद्दा भी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है। भारत चाहता है कि आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और मजबूत संदेश दिया जाए। विशेष रूप से अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले और सीमा पार आतंकवाद से जुड़े मुद्दों को साझा दस्तावेज में शामिल करने की कोशिश की जा सकती है।मई 2026 में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के परिणाम दस्तावेज में पहलगाम हमले और सीमा पार आतंकवाद का उल्लेख किया गया था। इसमें आतंकवादियों की आवाजाही, आतंकवाद के लिए आर्थिक सहायता और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने जैसे मुद्दों पर भी चिंता जताई गई थी। भारत इसी आधार पर शिखर सम्मेलन में भी आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट भाषा चाहता है।हालांकि इस विषय पर भी सदस्य देशों के बीच मतभेद की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान के साथ चीन के करीबी संबंध और सऊदी अरब के नए रक्षा समझौते को देखते हुए भारत द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा पर दूसरे देशों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। फिर भी आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक रुख ऐसा विषय है, जिस पर ब्रिक्स के सदस्य कई मौकों पर एकजुटता दिखाते रहे हैं।

ब्रिक्स में सर्वसम्मति की व्यवस्था बन सकती है सबसे बड़ा पेंच

ब्रिक्स में निर्णय लेने की प्रक्रिया सर्वसम्मति पर आधारित है। इसका अर्थ है कि किसी महत्वपूर्ण साझा दस्तावेज को जारी करने के लिए सभी सदस्य देशों की सहमति आवश्यक होती है। यदि किसी एक सदस्य देश को दस्तावेज में शामिल किसी महत्वपूर्ण बिंदु पर आपत्ति हो और वह सहमति न दे, तो पूरे साझा घोषणापत्र को रोकने की स्थिति पैदा हो सकती है।यही वजह है कि पश्चिम एशिया के संघर्ष जैसे संवेदनशील मुद्दों पर एक-एक शब्द को लेकर भी बातचीत लंबी खिंच सकती है। भारत को ऐसी भाषा तैयार करनी होगी, जो ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब सहित सभी संबंधित देशों को स्वीकार्य हो। इसके साथ ही रूस, चीन, ब्राजील और अन्य सदस्य देशों की प्राथमिकताओं का भी ध्यान रखना होगा।

सहमति नहीं बनी तो क्या होगा

यदि सभी सदस्य देशों के बीच साझा घोषणापत्र को लेकर अंतिम सहमति नहीं बन पाती है, तो मेजबान देश की ओर से अध्यक्षीय बयान जारी किया जा सकता है। इसमें सम्मेलन के दौरान हुई चर्चाओं, जिन विषयों पर सहमति बनी और जिन मुद्दों पर मतभेद रहे, उनका उल्लेख किया जा सकता है। हालांकि अध्यक्षीय बयान का राजनीतिक महत्व साझा घोषणापत्र से अलग होता है।इसके अलावा अलग-अलग देश अपनी ओर से स्वतंत्र बयान भी जारी कर सकते हैं। उदाहरण के लिए भारत अपने रुख को अलग से स्पष्ट कर सकता है और ईरान या संयुक्त अरब अमीरात भी अपनी-अपनी स्थिति सामने रख सकते हैं। लेकिन इससे ब्रिक्स की सामूहिक सहमति का वह संदेश नहीं बन पाएगा, जो एक साझा घोषणापत्र के माध्यम से जाता है।

मई में भी साझा बयान पर नहीं बन पाई थी सहमति

मई 2026 में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान भी ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेदों के कारण साझा घोषणापत्र जारी नहीं हो पाया था। इसके बाद भारत को अध्यक्षीय बयान और परिणाम दस्तावेज के माध्यम से बैठक की कार्यवाही को सामने रखना पड़ा था।यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि ब्रिक्स के इतिहास में पहली बार विदेश मंत्रियों की बैठक साझा घोषणापत्र के बिना समाप्त हुई थी। ऐसे में सितंबर में होने वाला शिखर सम्मेलन इस बात की परीक्षा भी होगा कि भारत सदस्य देशों के बीच मौजूद मतभेदों को किस तरह बातचीत के जरिए दूर कर पाता है।

क्या इस बार जारी होगा साझा घोषणापत्र

विशेषज्ञों का मानना है कि तमाम अड़चनों के बावजूद साझा घोषणापत्र जारी होने की संभावना बनी हुई है। सभी सदस्य देशों के लिए यह जरूरी है कि सम्मेलन के अंत में किसी साझा निष्कर्ष को दुनिया के सामने रखा जाए। भारत भी अपनी अध्यक्षता में होने वाले सम्मेलन को सफल बनाने के लिए अंतिम क्षण तक सभी पक्षों के बीच सहमति बनाने की कोशिश करेगा।पश्चिम एशिया का संघर्ष, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव, सऊदी अरब की नई सुरक्षा साझेदारी और आतंकवाद जैसे मुद्दे बातचीत को कठिन जरूर बना सकते हैं। लेकिन ब्रिक्स की बैठकों में अक्सर संवेदनशील मुद्दों पर ऐसी भाषा खोजी जाती है, जिसे सभी सदस्य देश स्वीकार कर सकें। इसलिए अंतिम समय में किसी समझौते की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत किस तरह ऐसी संतुलित भाषा तैयार करता है, जिससे किसी एक देश को राजनीतिक रूप से असहज किए बिना ब्रिक्स की सामूहिक चिंता सामने रखी जा सके। सम्मेलन के दौरान होने वाली बंद कमरे की बातचीत और अंतिम दौर की कूटनीतिक वार्ता यह तय करेगी कि दिल्ली से साझा घोषणापत्र निकलता है या फिर अध्यक्षीय बयान से ही काम चलाना पड़ता है।

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