घायल का इलाज रोकना डॉक्टर की लापरवाही:हाईकोर्ट ने कहा- पहले जान बचाएं, औपचारिकताएं बाद में, लगाया 25000 का जुर्माना
लखनऊ हाईकोर्ट ने कहा है कि सड़क हादसे में घायल का इलाज पुलिस या मेडिको-लीगल औपचारिकताओं के नाम पर नहीं रोका जा सकता। डॉक्टरों का प्राथमिक फर्ज घायल को तुरंत मेडिकल सुविधा देना है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की बेंच अंजू प्रकाश श्रीवास्तव की 2000 की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। 25 साल तक जवाब न देने पर कोर्ट ने राज्य सरकार पर 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाया, जो याचिकाकर्ता को मिलेगा। अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को है। कोर्ट ने साफ किया कि हर डॉक्टर का दायित्व जीवन बचाना है। सरकारी या निजी अस्पताल के डॉक्टर घायल को तत्काल इलाज दें। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2016 के 'सेव लाइफ फाउंडेशन' फैसले और 2015 की 'गुड समैरिटन गाइडलाइंस' का हवाला दिया। इन नियमों के मुताबिक, इमरजेंसी में घायल को इलाज न देना पेशेवर गलती है। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा है कि इन नियमों के पालन और निगरानी की व्यवस्था का ब्योरा दें।
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