जमकर झूमी गुलवीर की 98 साल की दादी:नाती गुलवीर के पद पर बोलीं- शरीर में अब वो ताकत नहीं, गोलू घर आएगा तो फिर जमकर नाचूंगी
पोते ने देश के लिए सिल्वर जीता तो 98 साल की दादी गेंदो देवी का शरीर उम्र की थकान भूल गया। शुक्रवार शाम दादी गेंदो देवी खुशी में झूमीं तो शनिवार सुबह भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ। नाचते-नाचते सांस फूलने लगी तो बोलीं- “अब शरीर में वो करंट नहीं रहा, ताकत भी नहीं रही... लेकिन मेरा गोलू गांव आएगा तो फिर जमकर नाचूंगी।” अलीगढ़ के सिरसा गांव के धावक गुलवीर सिंह की एशियन गेम्स में सिल्वर जीतने की खुशी परिवार के लिए सिर्फ एक पदक की खुशी नहीं है, बल्कि करीब 10 महीने के इंतजार का भी जवाब है।
गुलवीर ने पुरुषों की 10 हजार मीटर दौड़ में 28 मिनट 29.38 सेकेंड का समय निकालकर रजत पदक जीता। इससे पहले हांगझोउ एशियन गेम्स में वह कांस्य जीत चुका है। इस बार उसने एक पायदान ऊपर चढ़ते हुए सिल्वर अपने नाम किया। अब परिवार की नजर उसकी अगली दो दौड़ों पर है। गुलवीर के भाई ने कहा कि अभी दो दौड़ बाकी हैं और उन्हें पूरा भरोसा है कि छोटा भाई इस बार गोल्ड मेडल लेकर लौटेगा।
10 महीने से गांव नहीं आया, अब दादी को सिर्फ घर लौटने का इंतजार
गुलवीर लगातार करीब 10 महीने से गांव से दूर है। कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स की तैयारी के बीच उसका अधिकांश समय ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं में बीता। मां लक्ष्मी देवी और दादी गेंदो देवी के लिए बेटे-पोते की यह कामयाबी गर्व का विषय है, लेकिन दोनों की खुशी में एक कसक भी है, गुलवीर अभी तक घर नहीं लौटा है।
परिजनों को उम्मीद है कि एशियन गेम्स की व्यस्तता खत्म होने के बाद अक्टूबर में गुलवीर घर आ सकता है। दादी गेंदो देवी कहती हैं कि इस बार वह उसे सामने देखकर फिर नाचेंगी। शुक्रवार की खुशी में नाचते हुए जब उनकी सांस फूलने लगी तो उम्र का हवाला देकर खुद ही बोलीं कि अब पहले जैसी ताकत नहीं रही। इसके बाद भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ।
बहन की शादी में आने का देता रहा भरोसा, विदाई तक नहीं पहुंचा
गुलवीर के खेल के प्रति समर्पण की कहानी परिवार के त्याग से भी जुड़ी है। इसी साल फरवरी में उसकी बहन की शादी थी। गुलवीर शादी में नहीं पहुंच सका। बहन को दुख न हो, इसलिए वह फोन पर उसे दिलासा देता रहा कि वह आ रहा है। कभी फ्लाइट में होने की बात कही तो कभी रास्ते में होने की। परिवार भी उसकी बहन को यही भरोसा देता रहा। लेकिन विदाई तक गुलवीर नहीं पहुंचा।
आखिर में बहन को सच बताया गया कि गुलवीर खेल की तैयारियों और प्रतियोगिताओं में व्यस्त है और मजबूरी में शादी में शामिल नहीं हो पा रहा। परिवार के लिए यह भावुक पल था, लेकिन गुलवीर की नजर उस वक्त देश के लिए दौड़ने की तैयारी पर थी।
किसान का बेटा, तीन भाइयों में सबसे छोटा; दो बेटियों का पिता
गुलवीर बेहद साधारण किसान परिवार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स तक पहुंचा है। उसके पिता पप्पू सिंह किसान हैं। तीन भाइयों में गुलवीर सबसे छोटा है। उसकी शादी हो चुकी है और उसकी दो बेटियां हैं। छोटी बेटी अभी करीब छह महीने की है। परिवार से दूर रहकर लगातार ट्रेनिंग करने वाले गुलवीर के लिए हर अंतरराष्ट्रीय पदक के पीछे घरवालों का भी उतना ही इंतजार और त्याग जुड़ा है।
कभी डकैतों के गांव की पहचान, अब देश के धावक का गांव
जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित सिरसा की पहचान भी समय के साथ बदली है। एक दौर में गांव को डकैतों के गांव के रूप में जाना जाता था। इसके बाद गांव में बदलाव आया। युवाओं का रुझान सरकारी नौकरियों की ओर बढ़ा और सेना व पुलिस में बड़ी संख्या में युवा पहुंचे। अब अंतरराष्ट्रीय धावक गुलवीर सिंह सिरसा की नई पहचान बन चुका है।
गांव में बच्चे अब गुलवीर की तरह एथलीट बनने का सपना देख रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जिस गांव ने देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर का धावक दिया है, वहां खिलाड़ियों के अभ्यास के लिए भी उसी स्तर की सुविधा होनी चाहिए।
गुलवीर चाहता है गांव में बने एथलेटिक स्टेडियम
इसी वजह से ग्रामीण पिछले कई महीनों से सिरसा में एथलेटिक्स अभ्यास के लिए स्टेडियम बनवाने की मांग कर रहे हैं। गुलवीर भी इस मुद्दे को जनप्रतिनिधियों तक पहुंचा चुका है। उसका कहना है कि गांव में बेहतर ट्रैक और अभ्यास की सुविधा मिले तो आसपास के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा।
गुलवीर ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि घर लौटने के बाद वह प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री और अधिकारियों के सामने गांव में स्टेडियम बनवाने की मांग रखेगा। उसका सपना है कि सिरसा के बच्चों को आगे बढ़ने के लिए बाहर न जाना पड़े और गांव से आने वाली अगली पीढ़ी देश के लिए पदक जीते।
फिलहाल सिरसा की नजर गुलवीर की अगली दो दौड़ों पर है। परिवार गोल्ड की उम्मीद लगाए बैठा है और 98 साल की दादी गेंदो देवी अपने गोलू के घर लौटने का इंतजार कर रही हैं, ताकि इस बार नाचते हुए उन्हें सांस न रोकनी पड़े, बल्कि पोते को सामने देखकर दिल खोलकर जश्न मना सकें।
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