संस्कृत हमारी संस्कृति का मूल:गोरखनाथ मंदिर में आयोजित संगोष्ठी में बोले प्रो. मुरली मनोहर पाठक

Sep 27, 2026 - 15:34
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संस्कृत हमारी संस्कृति का मूल:गोरखनाथ मंदिर में आयोजित संगोष्ठी में बोले प्रो. मुरली मनोहर पाठक
ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक संगोष्ठी में रविवार को "संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति" विषय पर चर्चा हुई। मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि गोरखपुर भारतीय संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत ऐतिहासिक नगर है। भारतवर्ष की प्रतिष्ठा संस्कृत और संस्कृति पर ही आधारित है। भारत के लिए तीन शब्द महत्वपूर्ण हैं—पहला संस्कृत, दूसरा संस्कार और तीसरा संस्कृति। उन्होंने कहा कि संस्कृत, हमारी संस्कृति का मूल है। प्रो. पाठक ने कहा कि संस्कृत भाषा किसी के द्वारा बनाई नहीं गई है, यह भाषा सनातन भाषा है। यह भाषा देवभाषा भी है। यही भाषा हमारे संस्कारों की आधारभूत है। जो व्यक्ति संस्कृत भाषा नहीं पढ़ा होता है, वह भी अपना संस्कार संस्कृत में ही पूरा करता है। इन्हीं संस्कारों से संस्कृति का निर्माण होता है। संस्कारनिष्ठ जीवन शैली को संस्कृति कहा गया। संस्कृति का अनुवाद कल्चर हुआ है, किंतु कल्चर में वह संस्कृति का भाव नहीं है। प्रकृति और प्रत्यय से संस्कृति शब्द निर्मित होकर जो अर्थ देता है, वह कल्चर से कभी नहीं मिल सकता है। वर्तमान सरकार संस्कृत भाषा को सभी भाषाओं के मूल के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए विशेष बजट देकर भारतीय भाषा समिति बनाई है, जो संस्कृत के उत्थान के लिए कार्य करती है। उन्होंने कहा कि संस्कृत पढ़कर कोई भी व्यक्ति देवतुल्य हो जाता है। वह जो भी वाक्य बोलता है, वह देववाक्य हो जाता है। यह भाषा मानव-निर्माण की भाषा है। यह विश्व को कल्याणकारी उपदेश देने वाली भाषा है। इस भाषा में पूरे विश्व को अनुशासित करने का तथा शासन करने का सामर्थ्य है। इसी भाषा के आधार पर भारत विश्वगुरु बना था और आने वाले भविष्य में भी इसी को महत्व देकर बनेगा। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित कटक, ओडिशा के महंत शिवनाथ ने कहा कि भारतीय संस्कृति में सभी जीवों के त्रिविध दुःखों के नाश के लिए किसी मंत्र के अंत में तीन बार शांति, शांति, शांति कहकर पूरा किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गाई गई गीता भारतीय संस्कृति की मूल भावनाओं को हमारे सामने लाती है। यही कारण है कि विश्व के अनेक देशों में गीता सम्मान के साथ पढ़ी व पढ़ाई जाती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में दुनिया के कई देश परस्पर युद्ध व संघर्ष से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय संस्कृति उन्हें दिशा देने का कार्य कर सकती है। यही कारण है कि दुनिया हमारे प्रधानमंत्री मोदी से शांति प्रस्ताव लाकर मध्यस्थता करने का आग्रह कर रही है। भारतीय संस्कृति युद्ध की नहीं, अपितु बुद्ध की संस्कृति है। यहाँ युद्ध के पहले बुद्ध का मार्ग अपनाकर समझाने का पूरा प्रयास किया जाता है। संस्कृत भाषा में कहे गए हमारे आदर्श वाक्य तथा उनमें बताई गई जीवन शैली आज दुनिया को सुख व शांति का पाठ पढ़ा रही है।

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