बेटी दिवस: दूसरी बेटी पर आज भी मायूस होते परिजन:पहली बेटी पर जश्न, दूसरी पर मायूसी, दहेज और सुरक्षा है चिंता की वजह

Sep 27, 2026 - 13:58
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बेटी दिवस: दूसरी बेटी पर आज भी मायूस होते परिजन:पहली बेटी पर जश्न, दूसरी पर मायूसी, दहेज और सुरक्षा है चिंता की वजह
आगरा में बेटियों को लेकर परिवारों की सोच में पिछले 20 साल में बदलाव आया है। पहले जहां बेटी के जन्म पर करीब 70% माता-पिता और परिजन दुखी होते थे, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर करीब 40% रह गया है। हालांकि, पहली बेटी के बाद दूसरी बेटी होने पर आज भी कई परिवारों में मायूसी देखने को मिलती है। परिवारों की चिंता में शादी का खर्च, दहेज और बेटी की सुरक्षा जैसे कारण प्रमुख हैं। यह बात राष्ट्रीय बेटी दिवस के मौके पर एसएन मेडिकल कॉलेज के महिला रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. शिखा और जिला महिला चिकित्सालय की एसआईसी डॉ. पुष्पलता ने बताई पहली बेटी पर खुशी, दूसरी पर बेटा होने की उम्मीद डॉ. शिखा ने बताया कि पहली बेटी होने पर अब ज्यादातर परिवार इस बात से खुश होते हैं कि जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ हैं। लेकिन दूसरी बेटी होने पर कुछ परिवारों की सोच बदल जाती है। उनका कहना होता है कि पहले से एक बेटी है, दूसरी बेटी क्यों हो गई। अब दोनों की पढ़ाई, शादी और दहेज का खर्च कैसे उठाएंगे। बेटी की सुरक्षा को लेकर भी परिवार चिंता जताते हैं। उन्होंने बताया कि महिला रोग विभाग में आज भी ऐसी महिलाएं आती हैं, जो ससुराल पक्ष के दबाव की बात कहती हैं। कुछ महिलाएं कहती हैं कि इस बार बेटा होना चाहिए, क्योंकि बेटी होने पर उन्हें ससुराल में ताने और परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। 20 साल में 70% से घटकर 40% हुई निराशा डॉ. शिखा के अनुसार, करीब 20 साल पहले बेटी होने पर लगभग 70% माता-पिता या परिजन दुखी होते थे। अब यह संख्या करीब 40% रह गई है। उन्होंने कहा कि लोगों की सोच में सुधार आया है। पहले बेटी के जन्म पर परिवार काफी परेशान हो जाते थे, जबकि अब कई परिवार बेटी के जन्म पर खुशी मनाते हैं और उसे सेलिब्रेट करते हैं। उन्होंने कहा कि अभी भी कुछ परिवार बेटा और बेटी में अंतर करते हैं। इसका एक बड़ा कारण दहेज और सुरक्षा को लेकर बनी मानसिकता है। परिवारों को लगता है कि बेटी की शादी में काफी खर्च होगा और दहेज की व्यवस्था करनी पड़ेगी। साथ ही, उनके मन में यह सवाल रहता है कि भविष्य में बेटी की सुरक्षा कौन करेगा। दहेज और सुरक्षा की चिंता खत्म होगी तो भेदभाव भी घटेगा डॉ. शिखा ने कहा कि अगर समाज में बेटियों की सुरक्षा को लेकर भरोसा बढ़े और दहेज प्रथा खत्म हो तो बेटा-बेटी के बीच का भेदभाव भी कम होगा। उन्होंने कहा कि बेटी को परिवार पर बोझ मानने की सोच बदलने की जरूरत है। एसएन में सालभर में 4 से 5 हजार प्रसव एसएन मेडिकल कॉलेज के महिला रोग विभाग में एक साल में करीब 4 से 5 हजार प्रसव होते हैं। विभाग के अनुसार, बेटों की संख्या बेटियों की तुलना में करीब 1 से 2% अधिक रहती है। यानी प्रसव के मामलों में बेटियों और बेटों का अनुपात लगभग बराबर है। जिला महिला चिकित्सालय में भी दूसरी बेटी पर मायूसी जिला महिला चिकित्सालय की एसआईसी डॉ. पुष्पलता ने बताया कि पहले बेटी होने पर दुखी होने वाले माता-पिता का प्रतिशत करीब 60 से 70% तक था। अब यह घटकर करीब 40 से 50% रह गया है। उन्होंने कहा कि पहली बेटी होने पर लोग अब काफी खुशी मनाते हैं, लेकिन दूसरी बेटी होने पर कुछ परिवार आज भी मायूस हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि कुछ परिवारों में अब भी यह सोच है कि बेटा होने के बाद परिवार पूरा हो जाता है। इसलिए बेटे के जन्म पर ज्यादा खुशी मनाई जाती है, जबकि दूसरी बेटी होने पर परिवार थोड़ा निराश हो जाता है। हालांकि, समय के साथ बेटियों को लेकर लोगों की सोच में सकारात्मक बदलाव साफ दिखाई दे रहा है।

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