लखनऊ बायोस्कोप में सजी ‘म्यूजियम मिक्सर’:वक्ता बोले - अवधी सिर्फ बोली नहीं, लोककथाओं और जीवन के अनुभवों की भाषा है

Sep 27, 2026 - 21:35
0
लखनऊ बायोस्कोप में सजी ‘म्यूजियम मिक्सर’:वक्ता बोले - अवधी सिर्फ बोली नहीं, लोककथाओं और जीवन के अनुभवों की भाषा है
लखनऊ बायोस्कोप में रविवार को 10वें ‘म्यूजियम मिक्सर’ का आयोजन किया गया। इस बार कार्यक्रम में अवधी भाषा और क्षेत्र के सांस्कृतिक जीवन में उसके महत्व पर बातचीत हुई। कवि शादाब जावेद ने अवधी को रोजमर्रा के संवाद, मौखिक परंपराओं और लोगों के अनुभवों से जुड़ी भाषा के रूप में प्रस्तुत किया। चर्चा में कहा गया कि अवधी सदियों से लोगों के जीवन और संस्कृति का हिस्सा रही है। यह केवल एक बोली नहीं, बल्कि लोककथाओं, गीतों, कहावतों, मुहावरों, हास्य-बोध और रोजमर्रा के अनुभवों का जीवंत भंडार है। मौखिक परंपराओं के जरिए ये चीजें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं। शादाब ने साझा किए अवधी के मुहावरे गोंडा से आए कवि शादाब जावेद ने अवधी में होने वाले रोजमर्रा के संवाद और उससे जुड़े लोगों के रहन-सहन, आदतों पर बात की। उन्होंने अवधी के लोकप्रिय मुहावरों के उदाहरण भी साझा किए। इनमें ‘सूप बोले तो बोले, छलनी क्या बोले’ और ‘अपने मरे स्वर्ग दिखत है’ जैसे मुहावरे शामिल रहे। बताया कि अलग-अलग क्षेत्रों में अवधी के शब्दों, उच्चारण और अभिव्यक्ति में बदलाव दिखाई देता है। बातचीत के दौरान यह मान्यता भी सामने आई कि अवधी करीब 80 कोस के अंतराल में अपना रूप बदलती है। अवधी गीत किए गए याद गीत-कविताओं के जरिए याद की जीऐ सांस्कृतिक विरासत । म्यूजियम मिक्सर में प्रतिभागियों ने अवधी की सांस्कृतिक स्मृति से जुड़े मुहावरों, कविताओं और पंक्तियों को साझा किया। रफ़ीक़ शादानी की रचनाओं ‘उल्लू हो’ और ‘कुपंथी औलाद’ की पंक्तियों का भी चर्चा हुई । वक्ताओं ने ‘पान खाए सैयाँ हमारो’ और ‘हमरी अटरिया पे आओ रे साँवरिया’ जैसे लोकप्रिय गीतों को याद किया ।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User